दिव्या भारती – शख्सियत

90 के दशक में बॉलीवुड में परिवर्तन की एक लहर चली थी। यही दौर था जब नए और गुमनाम, लेकिन प्रतिभावान चेहरे लोगों की पसन्द बन रहे थे। इन्हीं चेहरों में से एक थीं, दिव्या भारती। दिव्या बेहद होनहार अभिनेत्री थीं। 90 के दशक में बड़े हुए लोग दिव्या का गाना ‘सात समुन्दर’ अब भी गुनगुनाते होंगे।दिव्या भारती उन चुनिन्दा अभिनेत्रियों में से थीं, जिन्होंने कम उम्र में ही हिन्दी फिल्म इन्डस्ट्री में एक मुकाम हासिल कर लिया था। सिर्फ 16 साल की उम्र में उन्होंने एक तमिल फिल्म बॉबीली राजा में काम किया था। इसके बाद उऩ्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा।


उस दौर की सुपर हिट शोला और शबनम, विश्वात्मा, दिल आसना है और दीवाना जैसी फिल्मों में दिव्या ने अपनी सफलता के झंडे गाड़े थे। हालांकि सिर्फ 19 साल की आयु में रहस्यमय मौत की वजह से उनके उड़ते हुए कैरियर पर ब्रेक लग गया। हम यहां दिव्या भारती की मौत के सम्बन्ध में कुछ तथ्यों को आपके सामने रखने जा रहे हैं, जो आप शायद ही जानते हों।
1. हत्या या आत्महत्या?

5 अप्रैल 1993 की रात को दिव्या भारती की आखिरी रात साबित हुई थी। कहा जाता है कि दिव्या की मौत मुम्बई के वर्सोवा इलाके में एक पांच मंजिली इमारत से गिरने की वजह से हुई। कुछ लोगों ने माना कि यह आत्महत्या का मामला था। जबकि कुछ लोगों को इस मौत में षड्यंत्र नजर आ रहा था। वे इसे निर्मम हत्या का मामला मान रहे थे। मुम्बई पुलिस इस मामले में सबूत जुटाने में कामयाब नहीं रही थी और इस केस की फाईल को 1998 में बन्द कर दिया गया।

2. षड्यंत्र की कहानियां

इस पूरे मामले को षड्यंत्र के तौर पर देखने वाले लोग दिव्या भारती के होने वाले पति साजिद नाडियाडवाला पर अंगुली उठा रहे थे। इस मृत्यु को अंडरवर्ल्ड के साथ जोड़ कर देखा जा रहा था। जबकि एक दूसरी थ्योरी के मुताबिक दिव्या भारती की साजिद के साथ बढ़ रही नजदीकियों और फिल्मी दुनिया में अप्रत्याशित सफलता ने उसे उसके माता-पिता से दूर कर दिया था। यही वजह है कि उन्होंने तनाव में आकर आत्महत्या कर ली। मामला चाहे जो भी हो दिव्या भारती की मौत का मसला अब भी एक रहस्य बना हुआ है।

3. काली रात

कहा जाता है कि जिस रात यह घटना हुई थी, उसी दिन दिव्या भारती ने अपने लिए एक फ्लैट खरीदा था। इस चार बेडरुम वाले फ्लैट पर वह अपने भाई के साथ लंबे समय तक गप्प लड़ाती रही थीं। इससे एक दिन पहले ही वह चेन्नई से एक शूटिंग खत्म कर लौटी थीं। 5 अप्रैल को दिव्या के फिल्म की शूटिंग हैदराबाद में होनी थी, लेकिन फ्लैट खरीदने की वजह से दिव्या ने इस दिन अपनी शूटिंग कैन्सिल कर दी थी और अगले दिन की तारीख दी थी। यह भी कहा जाता है कि दिव्या भारती ने अपने पैर में चोट होने की वजह से शूटिंग को टाल दिया था। रिपोर्ट के मुताबिक दिव्या इस दिन डिजायनर नीता लुल्ला और उनके पति के साथ अपने वर्सोवा वाले फ्लैट पर मुलाकात करने वाली थीं। वर्सोवा का यह फ्लैट दिव्या के नाम पर पंजीकृत नहीं था।

4. घटना के पहले

नीता लुल्ला अपने पति के साथ रात 10 बजे दिव्या के फ्लैट पर पहुंची। तीनों ड्राइंग रूम में बैठे थे और लगातार बातें कर रहे थे। तभी दिव्या अपने किचन में चली गईं। इसी बीच नीता और उसके पति टीवी पर एक विडियो देखने में मशगूल हो गए थे।

5. फ्लैट से गिरने के ठीक पहले

दिव्या भारती के ड्राइंग रूम से जुड़ी हुई कोई बालकनी नहीं, बल्कि एक बड़ी खिड़की थी। दुर्भाग्य से इस खिड़की में ग्रिल नहीं था और इसके नीचे एक गाड़ियों को पार्क करने की जगह थी। घटना के वक्त उस जगह पर कोई गाड़ी पार्क कर नहीं रखी गई थी। कहा जाता है कि किचन से लौटने के बाद दिव्या उस खिड़की की पतली दीवाल पर बैठ गई थीं। लेकिन संतुलन बिगड़ने वजह से वह पांच मंजिली इमारत से नीचे गिर पड़ीं।

6. दिव्या के आखिरी पल

इतनी ऊंचाई से गिरने के बाद दिव्या खून से लथपथ पार्किंग क्षेत्र में पड़ी थीं। उनकी नब्ज चल रही थी और जल्दी ही उसे मुम्बई के कूपर हॉस्पीटल ले जाया गया, जहां उन्होंने आखिरी सांस ली।


आज दिव्या भारती हमारे साथ नहीं है, लेकिन उन्होंने कुछ बेहतरीन फिल्में की थीं। उनकी यादें हमेशा हमारे साथ रहेंगी।

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कैसे सीखें 30 भाषाएं?

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आप कितनी भाषाएं जानते हैं, बोलते हैं या कम से कम समझ लेते हैं?
आपका जवाब शायद, दो-तीन या फिर ज़्यादा से ज़्यादा चार होगा. लेकिन, अगर हम आपको ये कहें कि दुनिया में ऐसे भी लोग हैं जो दो, चार, पांच नहीं, बल्कि बीस-तीस ज़बानें बोलते हैं, वो भी एक जैसी रवानी से तो आप क्या कहेंगे.
बीबीसी संवाददाता, डेविड रॉबसन जब बर्लिन में एक सम्मेलन को कवर करने पहुंचे तो वहां का माहौल देखकर चौंक गए.
वहां एक इमारत की बालकनी में बैठे कुछ लोग धड़ाधड़ जर्मन, हिंदी, नेपाली, पोलिश, क्रोएशियन, चीनी और थाई भाषा के शब्द बोल रहे थे. रॉबसन को लगा कि ये लोग सिर्फ़ बोल नहीं रहे, एक दूसरे पर शब्दों की बमबारी कर रहे थे.

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पास ही एक कमरे में कुछ और लोग थे, जो अलग-अलग ज़बानों के मुश्किल लफ़्ज़ बोलने की प्रैक्टिस कर रहे थे. वहीं एक कोने में कुछ लोग, अलग-अलग भाषाओं के मुश्किल शब्दों को समझने-समझाने का मुश्किल खेल खेलने की तैयारी में थे.
रॉबसन को ये कांफ्रेंस कम और सिरदर्द का इंतज़ाम ज़्यादा लगा.
असल में रॉबसन, बर्लिन में जिस सम्मेलन में गए थे, वहां दुनिया भर से आए हुए क़रीब 350 बहुभाषी जमा हुए थे. ये वो लोग हैं जो एक साथ कई-कई ज़बानें बोल लेते हैं.
इनमें से कई भाषाएं तो ऐसी हैं जो बहुत कम बोली जाती हैं, जिसे दूर-दराज़ में रहने वाले आदिवासी बोलते हैं. मसलन, ध्रुवों पर रहने वाले आदिवासी.

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रॉबसन के ज़ेहन में सवाल उठा कि आख़िर कोई इंसान एक साथ कितनी भाषाएं सीख और बोल सकता है. वो ख़ुद अंग्रेज़ी जानते हैं, थोड़ी सी इटैलियन आती है, और बमुश्किल डैनिश समझ पाते हैं.
लेकिन बहुभाषियों, जिन्हें अंग्रेज़ी में पॉलीग्लॉट कहते हैं, के सम्मेलन में तमाम दिलचस्प लोग और उनकी उनसे भी दिलचस्प कहानियां मौजूद थीं.
वैज्ञानिक नज़रिए से देखें तो कोई भी नई भाषा याद करना और फिर उसे धड़ल्ले से बोलना बेहद कठिन काम है. क्योंकि कोई नई ज़बान सीखने का मतलब, हमारे दिमाग़ को कई तरह से काम करना होता है.
उस भाषा के शब्द याद करने होते हैं, कम से कम दस हज़ार. फिर उनके बोलने का तरीक़ा याद करना होता है और फिर उसकी ग्रामर पर पकड़ बनानी पड़ती है. कुल मिलाकर एक नई ज़बान सीखने का मतलब है एक नई संस्कृति से रिश्ता जोड़ना.
ये काम कई मोर्चों पर होता है. वरना आप रोबोट की तरह अटक-अटककर कुछ शब्द बोल लेंगे, किसी भाषा पर आपकी पकड़ नहीं बन सकती.
नई भाषा सीखना बहुत मुश्किल दिमाग़ी कसरत है. इसके फ़ायदे भी हैं. कई ज़बानें बोलने वालों की याददाश्त काफ़ी तेज़ हो जाती है.
उनके दिमाग़ में जानकारी का ख़ज़ाना भी जमा हो जाता है. इससे भूलने की बीमारी होने की आशंका भी कम हो जाती है. कनाडा की यॉर्क यूनिवर्सिटी की वैज्ञानिक एलेन बियालस्तोक ने इस बारे में एक रिसर्च की थी.

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पता चला कि दो से ज़्यादा ज़बानें बोलने वाले लोगों में बढ़ती उम्र के साथ भूलने की बीमारी छह से नौ साल देर से आती देखी गई.
वैसे, पहले न्यूरोलॉजिस्ट ये कहते थे कि नई ज़बानें सीखना इतना आसान नहीं. इसके लिए किसी इंसान के पास बहुत कम वक़्त होता है. बचपन में हम नई बातें, नई चीज़ें ज़्यादा जल्दी से सीख सकते हैं. लेकिन, बढ़ती उम्र के साथ ये क्षमता कम होती जाती है.
हालांकि नए रिसर्च कहते हैं कि ये धारणा ग़लत है कि बढ़ती उम्र के साथ हमारी सीखने की क़ाबिलियत कम होती है.
अब बर्लिन के सम्मेलन में जो कई भाषाएं जानने वाले विशेषज्ञ जमा हुए थे, उन्होंने बचपन में तो सारी भाषाएं सीखी नहीं थीं. ज़्यादातर ने बड़े होकर ही नई-नई ज़बानों में महारत हासिल की थी.
जैसे इस सम्मेलन में शामिल होने आए बहुभाषाविद् टिम कीली को ही लीजिए.
उनका बचपन अमरीका के फ्लोरिडा में बीता था. वहां उन्होंने बहुत से लोगों को स्पैनिश बोलते हुए सुना था. रेडियो सुन-सुनकर कीली ने स्पैनिश सीखी.
लेकिन बाक़ी की ज़बानें उन्होंने दुनिया घूमने के दौरान सीखी. जैसे कोलंबिया में फ्रेंच, जर्मन और पुर्तगाली सीखी. स्विट्ज़रलैंड, पूर्वी यूरोपी देशों में और जापान गए तो वहां की भाषाएं सीख लीं. आज कीली बीस भाषाएं, धड़ल्ले से बोल सकते हैं.

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तो सवाल ये है कि कीली जैसे लोग इतनी सारी भाषाएं कैसे सीख गए? क्या आप-हम भी ऐसे ही कई भाषाएं बोल सकते हैं?
इसके लिए पहली शर्त है कि आपका इरादा पक्का होना चाहिए. हां, अगर आप बुद्धिमान हैं, तो आपको इससे मदद मिलेगी, मगर पहली शर्त नई भाषा सीखने का पक्का इरादा ही है.
कीली कहते हैं कि कई ज़बानें सीखने की अगली बड़ी ज़रूरत है कि आपमें एक साथ कई किरदार जीने की क़ाबिलियत होनी चाहिए. कुछ-कुछ गिरगिट जैसी, जो ज़रूरत के हिसाब से रंग बदल लेता है.
असल में हर भाषा बोलने का अपना अंदाज़ होता है, उसका अपना इतिहास होता है. हर ज़बान से जुड़ी संस्कृति होती है. तो जब आप कोई ख़ास भाषा बोलते हैं तो उसके तमाम पहलू भी अपना लेते हैं. जैसे फ्रेंच बोलेंगे तो थोड़ी रूमानियत आ जाएगी.
इस तरह हर ज़बान के साथ आपका किरदार बदल जाएगा. ज़रूरी ये है कि आप ज़िंदगी में एक साथ तमाम किरदार सीखने और निभाने की क्षमता रखते हों.
कई भाषाएं एक साथ बोलने वालों के साथ एक और पहलू जुड़ा होता है, याददाश्त का. हर भाषा अलग-अलग दौर में सीखी जाती है. जो ज़िंदगी के उस दौर के साथ ख़ास तौर से अपनी पहचान जोड़ लेती है.

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इस बारे में अमरीका की टेंपल यूनिवर्सिटी की अनेटा पावलेंको ने एक रिसर्च की है. उन्होंने रूसी मूल के ब्रितानी लेखक व्लादिमीर नाबोकोव का उदाहरण दिया.
जब नाबोकोव ने अपनी जीवनी लिखी तो पहले उसे अंग्रेज़ी में लिखा. लेकिन जब उन्होंने इसे ही रूसी भाषा में लिखना शुरू किया तो ज़िंदगी के और भी बहुत से पहलू याद आए, जो अंग्रेज़ी में लिखने के दौरान, ज़ेहन में नहीं आए थे.
रूसी भाषा में आत्मकथा छपने के बाद, नाबोकोव को उसमें और अंग्रेज़ी की जीवनी में इतना फ़र्क़ दिखा कि उन्होंने बायोग्राफ़ी को रूसी से फिर से अंग्रेज़ी में अनुवाद करके नए सिरे से छपवाया.
नई ज़बान सीखने की एक और शर्त है ख़ुद को नए सिरे से तलाशने की. जो लोग, भाषा के ज़रिए किसी नई संस्कृति से टकराते हैं, तो वो नए सिरे से अपनी पहचान बनाने की कोशिश करते हैं. जो लोग ये काम आसानी से कर लेते हैं, उन्हें नई भाषा सीखने में ज़्यादा दिक़्क़त नहीं होती.

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फिर आपको दूसरों की अच्छे से नक़ल करना आना चाहिए. जब आप किसी की नक़ल अच्छे से कर लेते हैं, तो उसके हाव-भाव आसानी से सीख लेते हैं. ऐसा ही नई भाषा के साथ होता है, उसके बोलने का तरीक़ा सीखना, उस भाषा को बोलने वालों की नक़ल करने जैसा होता है, जिसे सीखकर, ख़ुद को उसमें ढालकर, इंसान आसानी से नई भाषा सीख सकता है.
मतलब ये कि अगर, आप एक्टिंग कर सकते हैं, नए हाव-भाव सीखकर आसानी से उन्हें अपना सकते हैं, तो आप उतनी ही आसानी से नई ज़बान सीख सकते हैं.
तो क्या इसका मतलब ये हुआ कि एक्टिंग करने वाले आसानी से नई-नई भाषाएं सीख सकते हैं? इस सवाल का जवाब, हम अमरीकी एक्टर माइकल लेवी हैरिस के उदाहरण से समझ सकते हैं.
हैरिस को दस भाषाएं बोलने में महारत हासिल है. इन दस भाषाओं के अलावा कोई बारह और ज़बानों को वो समझ भी लेते हैं.
न्यूयॉर्क के रहने वाले हैरिस, जब लंदन में होते हैं और अंग्रेज़ी बोलते हैं तो उनका अंदाज़ एकदम अलग होता है. वो किसी ब्रितानी सामंत की तरह बर्ताव करते हैं. लेकिन दूसरी भाषाएं बोलते वक़्त उनका अंदाज़ एकदम बदल जाता है.

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हैरिस कहते हैं कि किसी भाषा के साथ उसकी संस्कृति अपनाना भी ज़रूरी है. ये काम आसानी से हो सकता है, अगर उस ज़बान को बोलने वाले की नक़ल की जाए, वो भी बिना किसी हिचक के.
हैरिस मशविरा देते हैं कि किसी भी नई भाषा को सीखने के लिए, उसके शब्द सुनिए और ज़ोर-ज़ोर से बिना शर्माए-हिचकिचाए, उन शब्दों को बोलिए.
आपका अंदाज़, उस इंसान से अलग होगा, जिसकी वो मातृ भाषा (मादरी ज़बान या मदर टंग) होगी, मगर धीरे-धीरे आप उस ज़बान का लहजा, उसकी नज़ाकत समझ जाएंगे, उसे बोलने के अंदाज़ को सीखकर फिर आप वैसे ही बोलना शुरू कर देंगे.
अक्सर हम अपनी भाषा बोलने सुनने के इतने आदी होते हैं कि, दूसरी ज़बान के शब्द सुनने पर, उसके लहजे पर हंसी आती है, बोलना ख़राब लगता है. एक्टर माइकल हैरिस कहते हैं कि इस शर्मिंदगी, इस ख़राब फीलिंग से पार पाना, नई भाषा सीखने की पहली शर्त है.
जब आपके अंदर से ये हिचक निकल जाएगी, तो आप उस भाषा के तमाम शब्दों पर अपना हक़ जताएंगे, नए आत्मविश्वास से बोलेंगे. नई ज़बान सीखने की आपकी राह यहीं से आसान हो जाएगी.
हालांकि, शुरू से ही आपको एक साथ कई भाषाएं सीखने का एजेंडा नहीं रखना चाहिए. एक दो से शुरुआत कीजिए. सबसे ज़रूरी है कि नई ज़बान को उसके भाव के साथ अच्छे तरीक़े से व्यक्त कर पाना.
हाव-भाव अपनाने के साथ-साथ जो बात ज़रूरी है वो है, नए शब्दों का लगातार अभ्यास. करत-करत अभ्यास ते जड़मति होत सुजान…तो जितना आप नई भाषा के साथ मशक्कत करेंगे, प्रैक्टिस करेंगे, उतनी ही आपकी राह हमवार होती जाएगी.

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अगर आपके पास वक़्त नहीं है ज़्यादा, तो उस भाषा के गाने ही सुन लीजिए चलते फिरते, इससे भी मदद मिलेगी.
वैसे, ज़्यादातर लोग नई भाषा सीखने के लिए उत्साहित नहीं होते. लेकिन, जिन्हें दस बीस या तीस भाषाएं आती हैं, उन्हें इसके फ़ायदे पता हैं.
नई संस्कृति से मेल, नए लोगों से जान-पहचान, दुनिया देखने समझने का एकदम नया नज़रिया, हर नई भाषा के सीखते ही ये सब बदल जाता है.
बहुभाषी एक्टर हैरिस, कहते हैं कि वो काफ़ी दिनों तक दुबई में रहे. एक यहूदी होने के नाते ये बहुत चुनौती भरा था. मगर उन्होंने अरबी भाषा सीखी तो लेबनान का एक अरब नागरिक उनका दोस्त बन गया.
जब वो दुबई से अपने देश वापस आ रहे थे, तो सबसे ज़्यादा दुखी उनका अरब दोस्त ही था. ये था ज़बान का रिश्ता, जो एक यहूदी ने एक अरब से जोड़ लिया था.
बर्लिन के सम्मेलन में ख़ुद बीबीसी संवाददाता, डेविड रॉबसन ने देखा कि किस तरह रूसी, यूक्रेनियन, जर्मन और फ्रेंच बोलने वाले आपस में मिल-जुलकर रह रहे थे.
इस कांफ्रेंस से लौटकर, रॉबसन ने तो तय किया है नई भाषाएं सीखेंगे. और आप? अभी सोच ही रहे हैं. अरे भाई..सोचना ही क्या…नहीं दस बीस तीस, तो दो-तीन-चार नई ज़बानें ही सीख डालिए. याददाश्त भी अच्छी होगी और दुनिया देखने का नज़रिया भी नया होगा।

— साभार BBC Hindi

कभी अंग्रेजों ने भारतीय राजा से कर्ज लेकर बनवाया था रेलवे लाइन

कभी अंग्रेजों ने भारतीय राजा से कर्ज लेकर बनवाया था रेलवे लाइन; ये है पूरी कहानी —

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आज भले ही भारत को विदेशों से कर्ज लेना पड़ता है, लेकिन एक समय ऐसा था, जब यहां के राजा-महाराजा अंग्रेजों को विकासमूलक कार्यों के लिए कर्ज दिया करते थे।
जी हां, वर्ष 1870 में ब्रिटिश सरकार ने होलकर राजवंश के महाराजा तुकोजीराव होलकर द्वितीय से करोड़ों रुपए का कर्ज लेकर इन्दौर के आसपास रेल लाइन बिछाना शुरू किया था। यह रोचक कहानी आज भी रेलवे के इतिहास में दर्ज है।

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महाराजा तुकोजीराव होलकर द्वितीय मध्य रेलवे से होने वाले लाभ को बेहतर समझते थे। उनके द्वारा मुहैया कराए गए एक करोड़ रुपए के शुरुआती कर्ज से अंग्रेजी सरकार ने इन्दौर के नजदीक तीन रेलवे सेक्शन को जोड़ने का काम किया था।

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यही नहीं, रेल लाइन बिछाने के लिए महाराजा ने जमीन पूरी तरह निःशुल्क मुहैया करवाई थी।

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इस संबंध में 5 मई 1870 को शिमला में वायसरॉय और गर्वनर जनरल इन कौंसिल के समक्ष इस समझौते पर मुहर लगाई गई थी।
यहां रेलवे के तीन सेक्शन इंदौर-खंडवा, इंदौर-रतलाम-अजमेर और इंदौर-देवास-उज्जैन के ट्रैक्स की कुल लम्बाई 117 किलोमीटर थी। अंग्रेजों ने महज सात साल में ही इसका निर्माण पूरा कर लिया और इस पर भाप का इन्जन चलाना शुरू कर दिया गया।

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पहाड़ी इलाका होने की वजह से इस सेक्शन में रेल लाइन बिछाना टेढ़ी खीर था। यही नहीं, नर्मदा नदी पर काफी बड़े पुल का निर्माण भी किया गया। रेल इंजन को ट्रैक्स तक लाने के लिए हाथियों का उपयोग किया गया था।

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यह तस्वीर लंदन के अखबार में प्रकाशित की गई थी।

नीरजा भनोट – शख्सियत

359 लोगों को आतंकियों के चंगुल से बचाने वाली नीरजा भनोट आपको याद है?
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नीरजा भनोट एक ऐसा नाम, जिसने डर को भी डरने के लिए मजबूर कर दिया। उसके हौसले, जुनून के सामने एक बड़ी घटना ने भी अपने घुटने टेक दिए।
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23 वर्षीया नीरजा भनोट एक जिन्दादिल लड़की थी, जिसने 359 लोगों को आतंकवादियों के चंगुल से बचाया था। उस वक़्त नीरजा पैन एम एयरलाईन में वरिष्ठ फ्लाइट अटेंडेंट के तौर पर तैनात थी।
5 सितम्बर, 1986 यही वो तारीख है, जब नीरजा निःसंकोच, निडरता से अपनी आखिरी सांस तक अपने कर्तव्य के साथ खड़ी रही। 5 सितबंर को पैन एम 73 विमान कराची, पाकिस्तान के एयरपोर्ट पर खड़ा था, जहां पाइलट का इंतजार किया जा रहा था।
तभी अचानक सुरक्षा गार्ड के वेश में 4 आतंकवादी विमान के अंदर घुस आए और विमान पर कब्जा कर लिया। उस वक़्त विमान में करीब 400 यात्री थे।
विमान में पायलट न होने के कारण आतंकवादियों ने पाकिस्तानी सरकार पर दबाव डाला कि वह विमान में पायलट जल्द से जल्द भेजे। लेकिन पाकिस्तानी सरकार ने इससे इन्कार कर दिया।
आतंकवादियों ने तभी नीरजा और विमान में मौजूद बाकी क्रू मेंबर्स को सभी यात्रियों के पासपोर्ट लेने को कहा, ताकि वे किसी अमेरिकन को मारकर पाकिस्तानी सरकार पर दबाव डाल सकें। इस बात से सचेत होकर नीरजा ने विमान में मौजूद अमेरिकन यात्रियों के पासपोर्ट छुपाकर, बाकी सबके पासपोर्ट आंतकियों को दे दिए।
इसके बाद आंतकियों ने एक ब्रिटिश नागरिक को गनपॉइन्ट पर लिया और विमान के गेट के सामने खड़ा कर पाकिस्तानी सरकार को धमकी दी कि अगर पायलट नहीं भेजा गया तो वह उसे ज़िन्दा नहीं छोड़ेंगे, लेकिन नीरजा ने यहां अपनी समझदारी, सूझबूझ दिखाते हुए आतंकियों से बात कर, उस ब्रिटिश नागरिक को भी बचा लिया।
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जैसे-जैसे वक़्त बीत रहा था, वैसे-वैसे विमान का ईंधन भी ख़त्म हो रहा था। 17 घंटे बीत चुके थे, नीरजा को अंदाजा था कि ईंधन कभी भी ख़त्म हो सकता है। योजना के अनुरूप जब चारों तरफ अंधेरा हो गया, नीरजा ने विमान के सभी आपातकालीन दरवाजे खोल दिए।
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तभी सारे यात्री उन दरवाज़ों से अपनी जान बचाने के लिए कूदने लगे। वहीं दूसरी ओर आतंकियों ने भी अंधेरे में ताबड़तोड़ गोलीबारी शुरू कर दी। नीरजा चाहती, तो वह भी बाहर आ सकती थी, लेकिन अभी भी कई यात्री विमान में मौजूद थे। तभी पाकिस्तानी सेना के कमांडो भी विमान की घेराबंदी कर चुके थे, जिसमें कमांडो ने तीन आतंकियों को मार गिराया।
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नीरजा की मौत उस समय हुई, जब वह तीन बच्चों को लेकर आपातकालीन दरवाजे की तरफ जा रही थी, तभी चौथा आतंकी नीरजा के सामने आ गया। तीनों बच्चों को बचाने के लिए नीरजा ने अपनी जान की परवाह नहीं की। उन तीनों को उस आतंकी के चंगुल से बचाया, लेकिन तब तक आतंकी ने कई गोलियों से नीरजा को छलनी कर दिया था।
नीरजा के इस अतुल्य साहस की बदौलत उन्हें भारत सरकार ने सर्वोच्च नागरिक सम्मान अशोक चक्र से सम्मानित किया। तो वहीं पाकिस्तान ने भी नीरजा के साहस को सलामी देते हुए तमगा-ए-इन्सानियत से नवाज़ा।
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विमान हाईजैक होने से पहले की गई नीरजा की आखिरी फ्लाइट अनाउंसमेंट वाकई ‘वॉइस ऑफ़ करेज’ है यानी कि साहस की आवाज़। फॉक्स स्टार हिंदी ने अपने यूट्यूब चैनल पर नीरजा भनोट की असली आवाज़ को साझा किया है, जिसे आप यहां सुन सकते हैं।

English — commonly confused words

English — commonly confused words 

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English has a lot of commonly confused words. They either look alike, sound alike or, worst of all, look and sound alike but have completely different meanings. Other words look and sound different but are similar in meaning, and it’s hard to determine which is the correct one in a given context. Hopefully the following list of pairs of commonly confused words will help you keep them straightened out.

• Accept vs. Except

Accept (verb) – to receive
I accepted all my birthday gifts with gratitude.
Except (conjunction) – apart from; otherwise than; were it not true
When Susan travels, she packs everything except the kitchen sink.

• Affect vs. Effect

Affect (verb) – to have an effect on; influence; produce a change in; to stir the emotions
The dog’s death affected his owners.
Effect (noun) – anything brought about by a cause or agent; result
The new speed limit law had little effect on the speed of the motorists.
All Intensive Purposes vs. All Intents and Purposes

“All intensive purpose” is an incorrect use of the phrase “all intents and purposes.””All intents and purposes” is a phrase that means “for all practical purposes” or “under most usual situations.”
For all intents and purpose, she planned to buy the refrigerator but still wanted to check the reviews.

• A Lot vs. Allot

A lot (noun phrase) -many
A lot of people came to the party.
*”A lot” is always two separate words. “Alot” is not a real word. Allot (verb) – to distribute, give or assign
Fifteen minutes were allotted to each of the speakers at the conference.

• Allusion vs. Illusion

Allusion (noun) – an indirect reference
The Austin Powers movies often make allusions to the James Bond films.
Illusion (noun) – a false idea or conception; belief or opinion not in accord with the facts; an unreal, deceptive, or misleading appearance or image
The magician created the illusion that he was levitating.

• Awhile vs. A While

Awhile (adverb) – for a while; for a short time
The guests planned to stay awhile.
A while (noun) – for a short time; when while is used as the object of the preposition (for a while) then the “a” is separated from the “while”
The guests planned to stay for a while.

• Bad vs. Badly

Bad (adjective) – not good
Your feet smell bad.
Badly (adverb) – not well; in a bad manner; harmfully; incorrectly; wickedly; unpleasantly
Charlotte plays tennis very badly.
The people involved in the accident were badly hurt.

* Here, a note. Adjectives generally describe nouns, so even if you use the word “bad” following a verb in a sentence, if it’s meant to describe the thing itself, then use the adjective. “Bad” here means the same as “rotten,” “rancid” or “stinky,” all of which are adjectives. If you can replace “bad” with another adjective and still have a sentence that makes sense, then you know that “bad” was the correct choice. Adverbs often describe the manner in which something is done. To say, “your feet smell badly” is to say that your feet are inhaling through the nose and perceiving odors, and that they’re going about it all wrong. 

• Borrow vs. Lend

Borrow (verb) – to take or accept something for a short time with the intention of returning it to its rightful owner
May I borrow a pencil, please?
Lend (verb) – to give something for a short time with the intention of getting it back
Would you please lend me a pencil?

• Breath vs. Breathe

Breath (noun) – air taken into the lungs and then let out
Take a deep breath.
Breathe (verb) – to inhale and exhale
Just calm down and breathe.   

• Butt Naked vs. Buck Naked

Butt Naked is a phrase that means to be without clothes.
The baby tore off his diaper and ran around the house butt naked.
Buck Naked is a phrase that also means to be naked and without clothing.
The baby tore off his diaper and ran around the house buck naked.

* Note – Neither of these phrases is incorrect. The term buck naked may derive from the term buckskin, that which hides are fashioned. However, neither term has much etymological backing for one being more correct than another.

• Cache vs. Cash

Cache (noun) – a safe place to store supplies; anything stored or hidden in such a place
The hikers found a cache with some cash and jewels.
Cash (noun) – money, coins, bills; currency
ATM machines dispense cash.

• Chomp at the Bit vs. Champ at the Bit

Chomp at the bit – an over used and incorrect form of “champing at the bit”Champ at the bit (idiom) – ready or anxious; eager to be going or moving along.
The kids were champing at the bit to see the newest Harry Potter movie.

• Complement vs. Compliment

Complement (noun) – that which completes or brings to perfection; (verb) – to make complete
Red wine is a nice complement to a steak dinner.
Compliment (noun) – something said in admiration, praise, or flattery; (verb) – to pay a compliment to; congratulate
She gave me a nice compliment when she said I looked thin.

• Comprise vs. Compose

Comprise (verb) – to include; to contain; to consist of; to be composed of
The state of North Carolina comprises 100 counties.
Compose (verb) – to form in combination; make up; constitute
One hundred counties compose the state of North Carolina.

• Desert vs. Dessert

Desert (verb) – to forsake or abandon; to leave without permission; to fail when needed
Soldiers should not desert their posts.
Desert (noun) – dry, barren, sandy region
The largest desert in the world is the Sahara.
Dessert (noun) – a sweet course served at the end of a meal
Fruit makes a healthy dessert after lunch or dinner.

• Done vs. Did

Done (adjective) – completed; sufficiently cooked; socially acceptableDone (verb) – the past participle of do
After an hour, the roast was done.
Did (verb) – past tense of do
The children did not want to leave the playground.

• Elicit vs. Illicit

Elicit (verb) – to draw forth; evoke
The teacher elicited answers from the students.
Illicit (adjective) – unlawful; illegal
The teacher discovered illicit drugs in a student’s desk.

• Fair to Midland vs. Fair to Middling

Fair to midland – an incorrect use of the phrase “fair to middling”Fair to middling (phrase) – something that is moderate to average in quality
The temperature was fair to middling today.

• Had Bought vs. Had Boughten

Had Bought (verb) – the past perfect tense of the verb buy
The teacher had bought Christmas presents for all of students early in the year.
Had Boughten – incorrect usage of the past perfect tense

• Hone vs. Home

Hone (verb) – to sharpen; to yearn or long for; to grumble or moan
Practicing the piano daily is a good way to hone your skills.
Home (noun) – dwelling; place where a person lives
After the long drive, we were all ready to be home and asleep.

• Idiosyncrasy vs. Idiosyncracy

Idiosyncrasy (noun) – any personal peculiarity or mannerism; individual reaction to food or drug.
Twins have idiosyncrasies, which often help to distinguish one from the other.
Idiosyncracy is a misspelling of idiosyncrasy.

• Imitated vs. Intimated

Imitated (verb) – past tense of the verb imitate, which means to seek to follow the example of; impersonate; mimic
The toddler imitated the dog by crawling on hands and knees and barking.
Intimated (verb) – to make known indirectly; to hint or imply
The pirate intimated that he knew where the treasure was buried.

• In a Sense vs. In Essence

In a sense (idiom) – in a way; in one way of looking at it
In a sense, computers have been a boon to society.
In essence (idiom) – by nature; essentially
The cat is, in essence, quiet and timid.

• In One Foul Swoop vs. In One Fell Swoop

In one foul swoop – an incorrect use of the phrase “in one fell swoop”In one fell swoop – a phrase meaning “all at once”
In one fell swoop, the toy was demolished by the child.

• Its vs. It’s

Its (possessive pronoun) – of, belonging to, made by, or done by it
The dog will only eat its food when I am also eating.
It’s (contraction) of it + is
It’s a very strange dog.

• I Could Of vs. I Could Have

I could of – an incorrect use of the verb phrase could have; when written as a contraction “could’ve” sounds like “could of.”I could have – is the past perfect tense of the verb could
I could have gone to the play, but I had to study that night

• I Should of vs. I Should Have

I should of – an incorrect use of the verb phrase should have; when written as a contraction “should’ve” sounds like “should of.”I should have – is the past perfect tense of the verb should
I should have gone to the play instead of study because I failed my test anyway.

• I Would Of vs. I Would Have

I would of – an incorrect use of the verb phrase would have; when written as a contraction “would’ve” sounds like “would of.”I would have – is the past perfect tense of the verb would
I would have gone to the play except my car wouldn’t start.

• Lead vs. Led

Lead (noun) – a heavy, soft, malleable, bluish-gray metallic chemical element used in batteries and in numerous alloys and compounds
I think it was Mrs. White in the billiard room with the lead pipe.
Led (verb) – past tense and past participle of the verb “to lead”
The two coaches have each led their teams to numerous championships.

• Lose vs. Loose

Lose (verb) – to become unable to find; to mislay; to fail to win or gain
Did you lose your glasses again?
How many games did your team lose last season?
Loose (adjective) – not tight; giving enough room
I’ve lost twenty pounds, and now these jeans are really loose.

• More/Most Importantly vs. More/Most Important

More/most importantly – a phrase used often in writing to show emphasis; however, many grammarians insist that this is not correct usage. The adverbial ending of -ly is not needed. More/most important – this phrase should be used instead
The most important part of story is the ending.

• Passed vs. Past

Passed (verb) – past tense of the verb “to pass”
I think we passed the store. Let’s turn around and go back.
Past (adjective) – of a former time; bygone; (noun) – the time that has gone by; days, months, or years gone by
In the past, I’ve gotten lost a lot, but this time I know where we are.

• Precede vs. Proceed

Precede (verb) – to be, come, or go before in time, place, order, rank, or importance
The election of a new president precedes his inauguration.
Proceed (verb) – to advance or go on, especially after stopping
After your first assignment has been completed and approved, you may proceed to the second one.

• Principal vs. Principle

Principal (noun) – a governing or presiding officer, specifically of a school; (adjective) – first in rank, authority, importance, degree, etc.
The student’s parents had to have a meeting with the principal.
Principle (noun) – a fundamental truth, law, doctrine, or motivating force, upon which others are based
The student’s parents thought that they had instilled stronger moral principles in their son.

• Seen vs. Saw

Seen (verb) – past participle of the verb see; must be used with the verbs has, have, or had
I have seen the movie three times.

* Note: I seen the movie three times is not correct though it is commonly used in spoken language.
Saw (verb) – past tense of the verb see
I saw the movie yesterday.

• Sell vs. Sale

Sell (verb) – to give up, deliver or exchange for money
People who move often sell unwanted items instead of packing them.
Sale (noun) – the act of selling; the work, department, etc. of selling
After Christmas sales always bring in the bargain shoppers.

• Site vs. Sight

Sight (noun) – something seen, a view, field of vision
She was a sight for sore eyes.
Site (noun) – a piece of land considered for a specific purpose
The corner lot was a perfect site for the new shopping center.

• Spitting Image vs. Spirit and Image

“Spitting image” is a phrase that means exactly like. The first known use in writing of this phrase was in 1901.
Karen is the spitting image of her mother.
“Spirit and Image” – There is some speculation that the “spit” in the phrase “spitting image” came from the word “spirit” in the phrase “spirit and image.” However, there is no etymological basis for this belief since the phrase “spirit and image” used in reference to an exact likeness is not found in writing. The terms “spit,” “spit and image,” and “dead spit” have all been found to refer to a likeness since the 1800’s.

• Stationary vs. Stationery

Stationary (adjective) – not moving or not movable; fixed or still
I rode the stationary bike at the gym for an hour.
Stationery (noun) – writing materials; specifically, paper and envelopes used for letters
My grandmother has given me a lot of stationery over the years. I think she wants me to use it to write her.

• Taut vs Taunt

Taut (adjective) – tightly stretched; showing strain; tidy or well-disciplined
The taut rope held the luggage to the roof.
Taunt (verb) – to reproach in scornful or sarcastic language; to drive or provoke
The home team taunted the visitors with cheers every time the visiting team made an error.

• Than vs. Then

Than (conjunction) – used to introduce the second element in a comparison
My right foot is bigger than my left foot.
Then (adverb) – at that time; next in order; (adjective) – of that time; (noun) – that time
Take off all your clothes first. Then get in the shower.
Emily drove up to New York with her then boyfriend, Nick.
Let’s wait until we’re hungry; we can decide what we want to eat then.

• Their vs. There vs. They’re

Their (adjective) – of, belonging to, made by, or done by them
They were proud of their work.
There (noun) – that place or point
Just put it over there.
They’re (contraction) of they + are
They’re going out to dinner tonight.

• To vs. Too vs. Two

To (preposition) – in the direction of and reaching; as far as; to the extent of
I’m going to Baltimore.
Too (adverb) – in addition; as well; besides; also; more than enough; superfluously; overly; to a regrettable extent; extremely
I’m going to Baltimore, too.
I’m too busy. I can’t go to Baltimore.
Two (adjective) the number 2
I have two jobs.

• Your vs. You’re

Your (adjective) – belonging to you
Is this your dog?
You’re (contraction) – you are
You’re a great mother!

• Who vs. Whom

Who (subject pronoun) – what or which person or persons; the person or persons that, or a person that (used to introduce a relative clause)
Who is going to the party with you?
Whom (object pronoun) – what or which person or persons; the person or persons that, or a person that (used to introduce a relative clause)
With whom are you going to the party?

कवि प्रदीप जन्मदिन विशेष

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छह फरवरी देश प्रेम और देश-भक्ति से भरी भावनाओं को सुंदर शब्दों में पिरोकर लोगों तक पहुँचाने वाले कवि प्रदीप का जन्मदिन है.
6 फरवरी 1915 को उज्जैन के बड़नगर कस्बे में जन्मे कवि प्रदीप भले ही हमारे बीच ना हो लेकिन उनके गीत आज भी हमारे बीच अमर हैं.
‘चल चल रे नौजवान’, ‘दूर हटो ऐ दुनियावालों, हिंदुस्तान हमारा है’ और ‘ऐ मेरे वतन के लोगों’ गीत से ‘राष्ट्र कवि’ बने कवि प्रदीप के जन्मदिन पर उनकी बेटी से बीबीसी ने की ख़ास बातचीत.

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कवि प्रदीप की बेटी मितुल प्रदीप मुंबई में रहती हैं. बीबीसी से बातचीत में जहां उन्होंने अपने पिता से जुड़ी कई यादें साझा की, वहीं एक ऐसे मलाल का भी जिक्र किया जो कवि प्रदीप को ज़िंदगी भर रहा.
वो बताती हैं, “1943 में फ़िल्म ‘क़िस्मत’ के लिए पिताजी के लिखे गीत ‘दूरो हटो ऐ दुनियावालों…’ के कारण ब्रितानी सरकार ने उनके ख़िलाफ़ वारंट जारी किया था, जिसके चलते वो कई दिनों तक भूमिगत भी रहे.”
यह गीत इस क़दर लोकप्रिय हुआ कि सिनेमा में दर्शक इसे बार-बार सुनने की मांग करते थे और फ़िल्म की समाप्ति पर इस गीत को सिनेमा हॉल में दोबारा सुनाया जाने लगा था.

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मितुल के अनुसार उनके पिता एक सच्चे देशभक्त थे, जिनका असली नाम रामचन्द्र नारायण द्विवेदी था.
वो कहती हैं, “फ़िल्म ‘बंधन’ में लिखा उनका गीत ‘चल चल रे नौजवान’ राष्ट्रीय गीत बना. सिंध और पंजाब की विधानसभा ने इस गीत को राष्ट्रीय गीत की मान्यता दी और ये गीत वहां की विधानसभा में गाया जाने लगा.”
अभिनेता बलराज साहनी, जो उस समय लंदन में थे, उन्होंने इस गीत को लंदन के बीबीसी हिंदी रेडियो से भी प्रसारित किया था.

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देशभक्ति से ओतप्रोत गीत ‘ऐ मेरे वतन के लोगों’ को आज भी गाया जाता है.
27 जनवरी 1963 की शाम राजधानी दिल्ली के नेशनल स्टेडियम में जब लता मंगेशकर ने इस गाने को गाया था तो वहां मौजूद प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के साथ साथ सभी लोगों की आंखें नम हो गई थीं.
तत्कालीन राष्ट्रपति एस राधाकृष्णन और सभी कैबिनेट मंत्रियों के अलावा लगभग पूरी फ़िल्म इंडस्ट्री इस मौके पर मौजूद थी.
बॉलीवुड की जो हस्तियां वहां मौजूद थीं उनमें दिलीप कुमार, देव आनंद, राज कपूर, राजेंद्र कुमार, गायक मोहम्मद रफ़ी और हेमंत कुमार शामिल थे.
लेकिन मितुल बताती हैं कि दुर्भाग्य से उनके पिता को इस कार्यक्रम में आमंत्रित नहीं किया गया और बाद में नेहरू ने विशेष आग्रह कर तीन महीने बाद 21 मार्च 1963 को मुंबई में कवि प्रदीप से मुलाक़ात की और उन्हीं की आवाज़ में इस गीत को सुना.

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प्रदीप लिखते तो थे ही, गाते भी थे. फ़िल्म ‘जागृति’ के मशहूर गीत ‘आओ बच्चों तुम्हे दिखाएं झांकी हिंदुस्तान की’ गीत के गायक भी कवि प्रदीप ही थे.

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‘ऐ मेरे वतन के लोगों’ के अलावा कई सुपरहिट गीत कवि प्रदीप के खाते में आते हैं जिनमें प्रमुख हैं, ‘दे दी हमें आज़ादी’, ‘हम लाएं हैं तूफ़ान से कश्ती निकाल के, इस देश को रखना मेरे बच्चो संभाल के’ समेत कई देश भक्ति के गाने लिखें.

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मितुल बताती हैं कि भले ही फ़िल्मों के लिए कवि प्रदीप देशभक्ति और जोश से भरे गीत लिखते थे लेकिन वो असल ज़िन्दगी में बहुत मज़ाकिया थे और उन्हें घर में बने पकवानों का बहुत शौक रहता था.

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एक हैरान करने वाला तथ्य यह है कि 71 फ़िल्मों और 1700 गाने देने वाले कवि प्रदीप को आज तक पद्म भूषण, पद्मश्री या भारत रत्न जैसी कोई उपाधि नहीं मिली है.
उन्हें दादा साहब फाल्के अवॉर्ड ज़रूर दिया गया लेकिन इसके अलावा उनके खाते में एक भी पुरस्कार नहीं हैं.

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मितुल कहती है कि उनके पिता को आजीवन एक मलाल रहा.
वो कहती हैं, “पिताजी ने गीत ‘ऐ मेरे वतन के लोगों’ गीत को सैनिकों की विधवाओ के उद्धार के लिए दान में दिया था, यानी इस गाने की जो भी रॉयल्टी मिलेगी वो उन विधवाओ को मिलेगी. लेकिन उनके जाने तक ना तो म्यूजिक कंपनी ने कोई जवाब दिया और ना ही आर्मी ने.”
“वो पूछते रह गए कि उस गीत को हर 15 अगस्त और 26 जनवरी में इस्तेमाल किया जाता हैं लेकिन उसकी कमाई उन जवानों कि विधवाओं तक क्यों नहीं पहुँचती ? यह पैसा कौन ले रहा, इसकी लड़ाई आज भी जारी है.

— साभार BBC Hindi

काशी की तवायफों का आजादी में महत्वपूर्ण योगदान

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प्रतीकात्मक तस्वीर

तवायफों का इतिहास आज भले ही पन्नों में दफन हो चुका है, लेकिन काशी से इनका पुराना रिश्ता रहा है। 19वीं शताब्दी के शुरुआत में यहां के कई चौराहे और गलियों में महफिल सजायी जाती थी। इस दौरान वहां आजादी की रणनीति तैयार की जाती थी। यही नहीं, उनके द्वारा सजाई गई संगीत की महफिल से रईसों से पैसा जुटाकर क्रांतिकारियों को मुहैया कराया जाता था। 
 
काशी के राज दरबारों, रईसों की कोठियों के अलावा मंदिरों और मठों में भी इनकी संगीत की महफिल जमा करती थी। इसमें आजादी के तराने गुंजा करते थे। इस दौरान वहां अंग्रेजों से लोहा लेने की रणनीति बनाने के लिए क्रांतिकारी इकट्ठा होते थे। इनकी महफिल अक्सर शाम छह बजे के बाद ही सजती थी। इसमें मिलने वाले पैसों को वह चुपके से क्रांतिकारियों को दिया करती थीं। कई बार अंग्रेज अफसरों ने उनके यहां छापा भी मारा था। 
 
जानिए ऐसी ही कुछ तवायफों के बारे में बताया, जिन्होंने देश की आजादी में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। 19वीं शताब्दी की शुरुआत से लेकर 1940 के बीच चौक और डालमंडी में इनकी महफिल सजा करती थी। उस वक्त काशी के रईस भांग, बूटी और पान दबा कर इनकी महफिल में शामिल हुआ करते थे। यहां के पूर्वजों का संगीत में रुचि रखने का पुराना इतिहास रहा है। 

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जद्दन बाई की फाइल फोटो

जद्दन बाई
 
‘लागत करेजवा में चोट’ वृंदावनी श्रृंगार की ये ऐसी बंदिशें हैं जो जद्दन बाई की याद ताजा कराती हैं। कहा जाता है कि वह अपने समकालीन गायिकाओं में सबसे ज्यादा सुंदर थीं। अपने जमाने की मशहूर एक्ट्रेस नर्गिस इन्हीं की बेटी थीं। बनारस में चौक थाने के पास इनकी महफिल सजती थी। 
 
जद्दन बाई ने संगीत की शिक्षा दरगाही मिश्र और उनके सारंगी वादक बेटे गोवर्धन मिश्र से ली थी। उस जमाने में जद्दन बाई के कई गीत ग्रामोफोन में भी रिकॉर्ड किए गए थे। बताया जाता है कि जद्दन बाई अपने देश की आजादी के लिए अंग्रेजों से भागे क्रांतिकारियों को कई बार अपने महफिलों में शरण देकर जान बचा चुकी हैं। मुख्य रूप से वह ख्याल और ठुमरी गाया करती थीं।
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गौहर जान की फाइल फोटो

गौहर जान
 
काशी समाज के संयोजक और ग्वालियर घराने के गायक केके रस्तोगी ने अपने जमाने की सुर बाला गौहर जान के बारे में बताया कि उनकी महफिल कोलकाता (तत्कालीन कलकत्ता) में सजती थी। काशी के रईस उनके संगीत का आनंद उठाने वहां भी जाया करते थे। 
 
1917 के आस-पास गौहर जान काशी के रईसों के साथ आ गईं। वह ठुमरी, चैती, कजरी और ख्याल गाती थीं। गणेश मंडपम में इनकी महफिलों में आजादी के तराने गूंजा करते थे। अंग्रेजी हुकूमत ने कई बार इसका विरोध भी किया था।

सिद्धेश्वरी देवी
 
सिद्धेश्वरी देवी चंदा बाई की लड़की थीं। उन्होंने साल 1900 के आस-पास सीया जी महाराज से संगीत की तालीम ली। मणिकर्णिका घाट के पास उनका अपना घर हुआ करता था। सिद्धेश्वरी देवी का कोठा भी उनके घर में ही हुआ करता था, जहां संगीत के कद्रदानों की महफिल शाम होते ही सजने लगती थी। 
 
सिद्धेश्वरी देवी खेमटा, कहरवा, सादरा, टप्पा और खयाल की बंदिशें गाया करती थीं। बाद में उन्होंने आजादी के समय में कई देश भक्ति के गीत भी गाए। लोग उन्हें ‘स्वर जीवनी’ के नाम से भी जानते थे।
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रसूलन बाई की फाइल फोटो

रसूलन बाई
 
‘फुलगेंदवा न मारो मैका लगत जोबनवा (करेजवा) में चोट …।’ उस्ताद शंभू खां रसूलन बाई के उस्ताद थे। इनका कोठा दालमंडी में था। उनकी महफिल में रईस कद्रदानों की भारी भीड़ उमड़ा करती थी। केके रस्तोगी बताते हैं कि साल 1920-22 के आस-पास रसूलन बाई की संगीत की महफिल में आजादी की लड़ाई की रणनीति भी तैयार की जाती थी। 

छोड़ दिया था आभूषण पहनना 
 
रसूलन बाई ने आभूषण तक पहनना छोड़ दिया था। वह अपने कोठे पर लोगों को आजादी के तराने सुनाया करती थीं। उन्हें संगीत और तहजीब की मिसाल कहा जाता था। वह प्रमुख रूप से ठुमरी, टप्पा और चैती प्रमुख गाती थीं। ब्रिटिश हुकूमत ने रसूलन बाई को काफी प्रताड़ित भी किया।

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विद्याधरी की फाइल फोटो

विद्याधरी
 
19वीं शताब्दी में विद्याधरी गीत-गोविंद गाने वाली अकेली गायिका थीं। वह मूल रूप से चकिया की रहने वाली थीं। उन्हें सुनने के लिए देश के कोने-कोने से लोग आते थे। इनके कोठे पर अक्सर खड़ी महफिल लगा करती थी। वह बनारस के रईसों के घरों में भी जाकर संगीत की महफिल सजाया करती थीं। 
 
शाम 6 बजे के बार सजती थी महफिल
 
बताया जाता है कि इनकी ठुमरी, चैती, टप्पा और खयाल की बंदिशें ऐसी थीं कि लोग घंटों मंत्र मुग्ध रहते थे। इनका कोठा अक्सर शाम 6 बजे के बाद ही सजता था। महफिलों से मिलने वाले पैसों को वो चुपके से क्रांतिकारियों को दिया करती थीं। कई बार अंग्रेज अफसरों ने उनके यहां छापा भी मारा था।